ले चल माँझी तू मुझे बिठा के अपनी नाव। जाना मुझे उस पार है,नदी पार है गाँव।। लहर बीच ले नाव को हाथ थाम पतवार ओ रे माँझी तू मेरा बन जा खेवनहार। कई बरस के बाद मैं आया अपने गाँव। व्याकुल है मन मिलन को दौड़ रहे मेरे पाँव।। खेतों की पगडंडियाँ पीपल की वो छाँव। याद बहुत आता मुझे मेरा प्यारा गाँव।। देर न कर जल्दी चला तू अपनी पतवार। लगा टकटकी देखता राह मेरा परिवार।। रिपुदमन झा 'पिनाकी' धनबाद (झारखण्ड) स्वरचित एवं मौलिक ©Ripudaman Jha Pinaki #माँझी